Thursday, September 14, 2017

बरेली की बर्फ़ी ! या मिक्स्ड वेजीटेबल ?

हिन्दी फ़िल्म बरेली की बर्फ़ी के प्रदर्शन के उपरांत से ही उसकी प्रशंसा सुनता और पढ़ता आ रहा था । विगत दिनों जब यह मेरे नियोक्ता संगठन (भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड, हैदराबाद) के क्लब में प्रदर्शित हुई तो इसे देखने का अवसर मिला । फ़िल्म निश्चय ही स्वस्थ मनोरंजन प्रदान करती है और विलासिता से भरी हुई फ़िल्मों की भीड़ में अपनी एक अलग पहचान रखती है । कुछ वर्षों पूर्व प्रदर्शित तनु वेड्स मनु (२०११) से ऐसी ताज़गी भरी हिन्दी फ़िल्मों का एक नवीन चलन आरंभ हुआ है जो छोटे शहरों के मध्यमवर्गीय (अथवा निम्न-मध्यमवर्गीय) पात्रों को लेकर रचित कथाओं पर बनाई जाती हैं । ऐसी फ़िल्मों के पात्रों तथा विलासिता-विहीन अति-साधारण परिवेश से वह सामान्य दर्शक वर्ग अपने आपको जोड़ पाता है जिसके लिए राजप्रासाद-सदृश आवास, बड़ी-बड़ी सुंदर कारें, निजी विमान एवं हेलीकॉप्टर तथा अनवरत विदेश-यात्राओं से युक्त जीवन गूलर के पुष्प की भाँति अलभ्य है क्योंकि उसे ये  पात्र तथा यह परिवेश अपना-सा लगता है, जाना-पहचाना प्रतीत होता है । इसीलिए विगत कुछ वर्षों में ऐसी फ़िल्में लोकप्रिय हुई हैं । बरेली की बर्फ़ी इसी श्रेणी में आती है । इसके पात्र, परिवेश, भाषा एवं घटनाएं लुभाती हैं, हृदय को स्पर्श करती हैं ।

फ़िल्म उत्तर प्रदेश के बरेली शहर की बिट्टी नामक एक बिंदास स्वभाव की युवती तथा उसके दो युवकों के साथ बने प्रेम-त्रिकोण की कथा कहती है । फ़िल्म का नामकरण संभवतः इस आधार पर किया गया है कि बिट्टी के पिता एक मिठाई की दुकान चलाते हैं अन्यथा बिट्टी का व्यक्तित्व मिठास से अधिक नमक लिए हुए प्रतीत होता है । वह स्वयं बिजली विभाग में नौकरी करती है । उसका विवाह न हो पाने के चलते जब एक दिन वह घर से भागकर दूर चली जाने का निर्णय लेती है तो उसे स्टेशन पर स्थित बुक स्टाल से बरेली की बर्फ़ी शीर्षक से एक उपन्यास पढ़ने को मिलता है जिसे पढ़कर उसे यह लगता है कि कथानायिका का व्यक्तित्व तो बिलकुल वैसा ही है जैसा स्वयं उसका अपना व्यक्तित्व है । चूंकि कथा भी बरेली शहर की ही एक युवती की है तो उसे लगता है कि लेखक से मिलना चाहिए जिसने हूबहू उसके जैसी युवती की कल्पना की और उसके व्यक्तित्व तथा स्वभाव को ठीक से समझा । यहीं से वास्तविक कथा आरंभ होती है जिसमें वह मूल लेखक से मिलती तो है किन्तु किसी और रूप में क्योंकि मूल लेखक चिराग दुबे ने अपनी प्रेमिका के विरह की पीड़ा से सिक्त मानसिकता में लिखे गए इस उपन्यास को किसी और के नाम से प्रकाशित करवाया था । एक प्रिंटिंग प्रेस चलाने वाले चिराग ने ही प्रीतम विद्रोही नामक छद्म लेखक को शहर छोड़कर चले जाने पर विवश कर दिया था । चिराग की दुविधा यह है कि बिट्टी से पहले मित्रता और तदोपरांत प्रेम हो चुकने के उपरांत वह उसकी बरेली की बर्फ़ी के लेखक प्रीतम विद्रोही से मिलने के अनुरोध को ठुकरा नहीं सकता । और जब बिट्टी की प्रीतम विद्रोही से यह बहुप्रतीक्षित भेंट हो जाती है तो बिट्टी की सहेली रमा को भी सम्मिलित करता हुआ प्रेम का एक ऐसा जाल बन जाता है जिसमें कौन किसे प्रेम करता है, यह फ़िल्म के अंत में ही पता चलता है ।
जैसा कि मैंने पहले ही कहा, इस फ़िल्म का सबसे बड़ा गुण इसका अपना-सा लगने वाला परिवेश (घर, गलियां, बाज़ार, तालाब आदि) तथा जाने-पहचाने से निम्न-मध्यमवर्गीय पात्र ही हैं जो दर्शक के हृदय में स्थान बना लेते हैं । जावेद अख़्तर के स्वर में पात्रों से परिचय करवाया जाता है तथा वे सम्पूर्ण कथानक में सूत्रधार के रूप में बोलते रहते हैं । फ़िल्म का प्रथम भाग अत्यंत मनोरंजक है । दूसरा भाग भी कुछ कम नहीं लेकिन अपने अपेक्षित अंत तक पहुँचने से पूर्व अंतिम बीस-पच्चीस मिनट में फ़िल्म में भावनाओं का अतिरेक है जो फ़िल्म की गुणवत्ता को सीमित करता है । फ़िल्मकार ने बहुत-सी बातें अपनी सुविधा से समायोजित की हैं जो फ़िल्म की स्वाभाविकता को कम करती हैं । ध्यान से देखने पर ही पता चलता है कि लेखकीय स्वतन्त्रता के नाम पर कई असंभव-सी बातें फ़िल्म में डाली गई हैं और एक छोटी-सी कहानी को दो घंटे तक खींचा गया है । ऐसा लगता है कि बरेली की बर्फ़ी के निर्माता एक उत्कृष्ट फ़िल्म बनाना ही नहीं चाहते थे । वे केवल सत्तर एवं अस्सी के दशक में ऋषिकेश मुखर्जी तथा बासु चटर्जी जैसे निर्देशकों द्वारा साधारण परिवेश में साधारण भारतीय पात्रों को लेकर रची गई औसत मनोरंजन देने वाली फ़िल्मों की परंपरा में समाहित होने वाली एक ऐसी फ़िल्म बनाना चाहते थे जो औसत से कुछ बेहतर लगे । जब उत्कृष्टता लक्षित ही नहीं थी तो प्राप्त भी कैसे होती ? अतः कुल मिलाकर बरेली की बर्फ़ी एक साफ़-सुथरी मनोरंजक फ़िल्म से अधिक कुछ नहीं बन सकी ।

परिवेश के अतिरिक्त फ़िल्म के गुणों में इसके एक-दो अच्छे गीतों को एवं प्रमुख पात्रों के प्रभावशाली अभिनय को सम्मिलित किया जा सकता है । सभी मुख्य पात्रों – कृति सेनन, आयुष्मान खुराना, राजकुमार राव एवं स्वाति सेमवाल तथा नायिका के माता-पिता की भूमिका में पंकज मिश्रा तथा सीमा पाहवा के साथ-साथ नायक के मित्र की भूमिका में रोहित चौधरी ने प्रभावशाली अभिनय किया है । लेकिन इन सबमें राजकुमार राव (जो पहले राजकुमार यादव के नाम से जाने जाते थे) बाज़ी मार ले गए हैं । फ़िल्म जब-जब भी ढीली पड़ी, राजकुमार ने उसमें पुनः नवीन ऊर्जा का संचार कर दिया । एक दब्बू और एक तेतर्रार – दो भिन्न-भिन्न प्रकार के रूपों को एक ही भूमिका में उन्होंने ऐसी अद्भुत प्रवीणता से निभाया है जिसने मुझे विभाजित व्यक्तित्व पर आधारित गंभीर फ़िल्मों – 'दीवानगी' (२००२) में अजय देवगन तथा 'अपरिचित' (२००५) में विक्रम द्वारा किए गए असाधारण अभिनय का स्मरण करवा दिया । 

लेकिन बरेली की बर्फ़ी में मौलिकता का नितांत अभाव है । कुछ वर्षों पूर्व मैंने फ़िल्मों की स्वयं समीक्षा लिखने का निर्णय इसीलिए लिया था क्योंकि मैं कथित अनुभवी एवं प्रतिष्ठित समीक्षकों द्वारा लिखित कई समीक्षाओं में तथ्यपरकता तथा वस्तुपरकता का अभाव पाता था । फ़िल्मकार तो अपनी इधर-उधर से उठाई गई कथाओं के मौलिक होने के ग़लत दावे करते ही हैं, समीक्षक भी प्रायः फ़िल्मों की कथाओं के मूल स्रोत को या तो जानने का प्रयास नहीं करते या फिर उसकी बाबत ऐसी जानकारी अपनी समीक्षाओं में परोसते हैं जो तथ्यों से परे होती है । बरेली की बर्फ़ी भी अपवाद नहीं है । इसे २०१२ में प्रकाशित निकोलस बैरू द्वारा लिखित फ्रेंच भाषा के उपन्यास 'द इनग्रीडिएंट्स ऑव लव' पर आधारित बताया जा रहा है । लेकिन यह अपूर्ण सत्य है । पूर्ण सत्य यह है कि कई हिन्दी फ़िल्में भी बरेली की बर्फ़ी की कथा एवं पात्रों का आधार हैं । न केवल फ़िल्म की केंद्रीय पात्र बिट्टी का चरित्र स्पष्टतः तनु वेड्स मनु की नायिका तनूजा त्रिवेदी (तनु) के चरित्र से प्रेरित है और प्रीतम विद्रोही के चरित्र में हम दीवानगी के तरंग भारद्वाज की झलक देख सकते हैं, वरन फ़िल्म की पटकथा ही कुछ पुरानी फ़िल्मों के टुकड़े उठाकर बनाई गई है । फ़िल्म का मूल विचार माधुरी दीक्षित, संजय दत्त तथा सलमान ख़ान अभिनीत एवं लॉरेंस डी सूज़ा द्वारा निर्देशित सुपरहिट फ़िल्म साजन (१९९१) से सीधे-सीधे उठा लिया गया है और मध्यांतर के उपरांत की फ़िल्म संजना, उदय चोपड़ा एवं जिमी शेरगिल अभिनीत तथा संजय गढ़वी द्वारा निर्देशित यशराज बैनर की फ़िल्म मेरे यार की शादी है (२००२) को देखकर बनाई गई लगती है (जो स्वयं ही हॉलीवुड फ़िल्म – माई बेस्ट फ़्रेंड्स वेडिंग की विषय-वस्तु उठाकर बनाई गई थी) । फ़िल्म का नाम ही बरेली की बर्फ़ी है, वस्तुतः यह उस चटपटी तरकारी की भांति है जो कई सब्ज़ियों को मिश्रित करके उस मिश्रण में आवश्यक मसाले डालकर बनाई गई हो । बहरहाल इस मिक्स्ड वेजीटेबल को एक स्वादिष्ट व्यंजन कहा जा सकता है जो भोजन करने वाले की जिह्वा को तृप्त करने में सक्षम है ।

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Saturday, September 9, 2017

भारत की महान गुरु-शिष्य परंपरा पर आधारित हृदयस्पर्शी कथा

एक आदर्श शिक्षक तथा विद्यार्थियों के साथ उसके संबंध को केंद्र में रखकर अनेक हिन्दी फ़िल्में बनाई गई हैं । १९५४ में प्रदर्शित जागृति ऐसी ही एक महान फिल्म थी । उसके उपरांत भी विगत छह दशकों में इसी विषय को आधार बनाकर नर्तकी (१९६३), बूंद जो बन गई मोती (१९६७), परिचय (१९७२), अंजान राहें (१९७४), इम्तिहान (१९७४), बुलंदी (१९८१), हिप हिप हुर्रे (१९८४), सर (१९९३), आरक्षण (२०११) आदि अनेक फ़िल्में बनाई गईं जिनमें शिक्षक तथा छात्रों के सम्बन्धों को विभिन्न बिन्दुओं से देखा-परखा गया । जहाँ एक शारीरिक न्यूनता से पीड़ित बालक की व्यथा तथा उसे समझने वाले उदार शिक्षक की कथा को प्रस्तुत करती हुई एक असाधारण फ़िल्म तारे ज़मीन पर (२००७) के रूप में  आई वहीं आँसू बन गए फूल (१९६९) नामक एक ऐसी फ़िल्म भी आई जिसमें भ्रमित विद्यार्थी को उचित मार्ग दिखलाने वाले शिक्षक को विपरीत परिस्थितियों के वशीभूत होकर स्वयं ही मार्ग से भटकते हुए दर्शाया गया ।

लेकिन मैंने एक ऐसी फ़िल्म भी देखी जो प्राचीन भारत की महान गुरु-शिष्य परंपरा पर आधारित है । प्राचीन भारत में शिष्य गुरु के आश्रम में जाकर गुरु (तथा उसके परिवार) के साथ ही रहते हुए शिक्षा भी ग्रहण करता था एवं गुरु की सेवा भी करता था । इससे उसमें ज्ञान के साथ-साथ संस्कार भी विकसित होते थे । गुरु के साथ वर्षों तक रहकर वह सेवा, विनम्रता एवं सहनशीलता जैसे गुणों का मूल्य समझता था एवं उन्हें अपने व्यक्तित्व में आत्मसात् करके न केवल अपने एवं अपने आश्रितों के लिए वरन सम्पूर्ण समाज के लिए उपयोगी बनता था । गुरु अपने शिष्य का असत से सत की ओर, तम से प्रकाश की ओर तथा मृत्यु से अमरत्व की ओर पथ-प्रदर्शन करते हुए उसे एक आदर्श एवं कर्तव्यनिष्ठ नागरिक के रूप में ही नहीं मानवता से ओतप्रोत मनुष्य के रूप में विकसित करता था । अब न वे गुरु रहे, न वे शिष्य, न ही वैसी महान परम्पराएं । लेकिन जिस फ़िल्म की मैं बात कर रहा हूँ, उसमें इसी परंपरा को प्रस्तुत किया गया है । इस सरलता से परिपूर्ण किन्तु हृदय-विजयी फ़िल्म का निर्माण आजीवन भारतीय जीवन मूल्यों में आस्था दर्शाने वाले युगपुरुष स्वर्गीय ताराचंद बड़जात्या ने किया था । १९८० में निर्मित इस फ़िल्म का नाम है पायल की झंकार । शाश्वत भारतीय जीवन मूल्यों को प्रतिष्ठापित करने वाली इस फ़िल्म की गुणवत्ता इतनी उच्च है तथा मुझे यह इतनी प्रेरक लगती है कि जब-जब मैं अपने मन में नैराश्य अथवा नकारात्मक भावों को आच्छादित होते पाता हूँ, तो इस फ़िल्म को देख लेता हूँ जो मेरे अंधकार में डूबते मन में पुनः प्रकाश भर देती है ।
जागृति तथा आँसू बन गए फूल जैसी फ़िल्मों के निर्देशक सत्येन बोस द्वारा ही निर्देशित इस फ़िल्म का शीर्षक पायल की झंकार इसलिए रखा गया है क्योंकि इसकी प्रमुख पात्र एक बालिका है जिसमें नृत्य की स्वाभाविक प्रतिभा है एवं जो एक सुयोग्य गुरु से नृत्य की शिक्षा प्राप्त करके अपनी प्रतिभा को निखारना चाहती है । श्यामा नामक वह अभागी बालिका न केवल एक आर्थिक दृष्टि से दुर्बल पृष्ठभूमि से आती है वरन वह अनाथ भी है एवं अपने मामा-मामी के साथ रहते हुए नौकरानी की भाँति दिन-रात घर के काम करने के उपरांत भी अपनी मामी की प्रताड़नाएं सहती है । ऐसे परिवेश में रहती हुई किसी सुयोग्य गुरु से नृत्य-शिक्षा प्राप्त करने एवं अपनी प्रतिभा को नवीन उच्चताओं पर ले जाने का स्वप्न वह देखे भी तो कैसे ? मामा सहित कोई भी उसका अपना नहीं है जो उसकी प्रतिभा को पहचाने तथा उसके जीवन को संवारने की सोचे । लेकिन उसके दुर्भाग्य की काली घटाओं में एक क्षीण प्रकाश-किरण भी है – गोपाल, उसका बाल-सखा ।

किशोरी श्यामा की ही आयु का गोपाल न केवल अनाथ एवं अपने घर में नितांत एकाकी श्यामा के प्रति सहानुभूति एवं आत्मीयता रखता है वरन वह उसकी नृत्य-प्रतिभा को भी भली-भाँति पहचानते हुए उसे जीवन में अपना अभीष्ट प्राप्त करने में उसकी सहायता भी करना चाहता है । श्यामा कला के क्षेत्र में अपने गंतव्य तक पहुँचे, इसकी तीव्र अभिलाषा उसमें श्यामा से भी अधिक है । उसने स्वयं अपने पिता से ढोल एवं तबला वादन सीखा है । वह सदा श्यामा के लिए एक प्रेरक का कार्य करता है । उसी की प्रेरणा एवं सहायता से श्यामा अपने गाँव से दूर एक दूसरे गाँव में जा पहुँचती है नृत्य-गुरु किशन महाराज के पास । किशन महाराज एक सच्चे कला-साधक एवं गुरु हैं जो मानते हैं कि सच्चे कलाकार की निष्ठा कला के प्रति होती है, न कि धन एवं प्रसिद्धि के प्रति । वे किसी भी ऐसे व्यक्ति को अपना शिष्य नहीं बनाना चाहते जो यश-वैभव की लालसा से कला से जुड़े । भोले-भाले बालक श्यामा एवं गोपाल जब निर्दोषिता से उनसे इस विषय में बात करते हैं तो पहले वे उन्हें अन्यथा ही लेते हैं एवं यह कहकर भगा देते हैं कि उनके यहाँ कला का व्यापार नहीं होता लेकिन जब उन्हीं की विधवा पुत्री के माध्यम से श्यामा जब उनके घर में आश्रय ले लेती है तो अनायास ही उसकी नैसर्गिक प्रतिभा उनके समक्ष आ जाती है तथा वे उसकी नृत्य-कला के प्रति वास्तविक निष्ठा एवं समर्पण को भी जान जाते हैं । ऐसे में स्वाभाविक ही है कि वे मुक्त-हृदय से श्यामा को अपने शिक्षण में ले लेते हैं । सुयोग्य गुरु के सान्निध्य में रहकर एवं गुरु के ही परिवार का एक अंग बनकर गुरु द्वारा प्रदत्त दीक्षा से श्यामा किस प्रकार नृत्य-कला में पारंगत बनती है एवं किस प्रकार अपनी कला के द्वारा अपने गुरु के नाम को संसार में प्रकाशित करती है, यह आगे की कथा में आता है । अंत में श्यामा की सफलता का सहभागी उसका सखा एवं प्रेरक गोपाल भी बनता है ।
 
ताराचंद बड़जात्या की फ़िल्म-निर्माण संस्था राजश्री की गौरवशाली परंपरा के अनुरूप ही बनाई गई इस फ़िल्म को १९८१ में ऑस्कर पुरस्कारों के लिए भारतीय प्रविष्टि के रूप में भेजा गया था । यह फ़िल्म न केवल सादगी से परिपूर्ण एवं भारतीय ग्राम्य जीवन को हृदयस्पर्शी रूप से दर्शाने वाली है वरन अपने कण-कण में भारतीयता एवं भारतीय जीवन-मूल्यों को समेटे हुए है । जहाँ श्यामा के उदात्त चरित्र के माध्यम से कृतज्ञता, सेवाभाव एवं क्षमा जैसे गुणों को उकेरा गया है, वहीं गोपाल के चरित्र के माध्यम से परहिताभिलाषा एवं निस्वार्थ भाव से किए जाने वाले उपकार जैसे भावों को रेखांकित किया गया है । एक दृश्य में गोपाल को अपने पिता के चरण दबाते हुए दिखाया गया है जो पारंपरिक भारतीय परिवारों में बालकों को दिए जाने वाले उन उत्तम संस्कारों का प्रतीक है जो उनके व्यक्तित्व में चिरस्थायी हो जाते हैं । ऐसे ही सद्गुण किशन महाराज की विधवा पुत्री के माध्यम से भी दर्शाए गए हैं जो श्यामा की कठिन स्थिति को समझकर उसे घर में आश्रय देती है एवं तदोपरांत उसे अपनी सगी पुत्री की भाँति ही स्नेह देती है । जब किशन महाराज श्यामा द्वारा किए जा रहे दोहरे श्रम के संदर्भ में उससे बात करते हैं तो वह उसकी देह की मालिश तक करने को तत्पर हो जाती है । किशन महाराज के चरित्र के माध्यम से लेखक गोविंद मुनीस तथा निर्देशक सत्येन बोस ने एक सच्चे कला-मर्मज्ञ तथा एक सच्चे गुरु की महानता को दर्शक-समुदाय के समक्ष रखा है । उच्च-स्तरीय कलावंत होकर भी वे अत्यंत विनम्र हैं । अहंकार का अंश-मात्र भी उनमें नहीं है । उनका जीवन कला-साधना को समर्पित है, भौतिक सफलता एवं सांसारिक यश के पीछे वे नहीं भागते । उनके एक संवाद में घरेलू कामकाज की महत्ता को जिस प्रकार स्थापित किया गया है, वह इस तथ्य का जीवंत प्रमाण है कि फ़िल्म को निरूपित करने वालों ने भारतीय संस्कृति को कितने निकट से देखा और जाना है ।

पायल की झंकार का आरंभ ही श्रावण मास में लगने वाले एक मेले से होता है जो भारतीय सांस्कृतिक परंपरा का ही एक अंग है । तदोपरांत फ़िल्म का एक एक दृश्य इस प्रकार रचा गया है कि देखने वाले का अपना मन कलुषित हो तो भी उसमें उदात्त भाव उदित हुए बिना नहीं रह सकते । अनेक स्थलों पर फ़िल्म दर्शक के मानस को कुछ ऐसे भिगो जाती है कि नयनों में तरलता उमड़ पड़ती है एवं मनोमस्तिष्क का प्रत्येक कोण आलोकित हो उठता है । फ़िल्म का कण-कण इस सत्य को निरूपित करता है कि प्रत्येक मानव यदि सद्गुणों को आत्मसात् कर ले एवं सदाचार के पथ पर अग्रसर हो तो यह सम्पूर्ण सृष्टि ही सतोगुणी हो सकती है ।

फ़िल्म कला की भलीभाँति साधना करने एवं उसमें निष्णात होने से पूर्ण ही उसका प्रदर्शन करने लगने का निषेध करती है तथा कला-साधक के अपनी कला में दक्षता प्राप्त करने तक इस संदर्भ में धैर्य धारण करने पर बल देती है । और वांछनीय भी यही है । अपूर्ण ज्ञान तो अज्ञान से भी अधिक अवांछित होता है जिसका प्रदर्शन किसी भी समय प्रदर्शक को कठिनाई में डाल सकता है, उसे दर्शक-समुदाय के समक्ष उपहास का पात्र बना सकता है । फ़िल्म इस शाश्वत सत्य को भी रेखांकित करती है कि जहाँ चाह वहाँ राह । जिस पथिक के मन में अपने गंतव्य तक पहुँचने की सच्ची लगन लग जाए, उसे तो मार्ग स्वयं ही ढूंढ लेता है ।

फ़िल्म के अंतिम दृश्य में किशन महाराज द्वारा गोपाल को नृत्य-स्पर्द्धा में विजयी होने वाली श्यामा के प्रथम गुरु के रूप में चिह्नित करते हुए श्यामा को पुरस्कार उसी के करकमलों से दिलवाया जाना तथा दर्शक-समुदाय से उन बालकों को उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए आशीष देने हेतु कहना हृदय की गहनता में जाकर उसे स्पर्श कर जाता है । काश ऐसे दृश्य हमें वास्तविक जीवन में देखने को मिल सकें !

नर-नारी का प्रेम भारतीय कथा-साहित्य तथा फ़िल्म-जगत दोनों ही का अभिन्न अंग रहा है क्योंकि यही प्रेम सृष्टि का आधार है । यद्यपि यह प्रेम जीवन की सभी अवस्थाओं में हो सकता है, तथापि मेरा यह मानना है कि युवावस्था का प्रेम पूर्णतः निर्विकार नहीं हो सकता क्योंकि यह वह अवस्था होती है जिसमें देहाकर्षण का प्राबल्य होता है । इसके विपरीत बाल्यावस्था का प्रेम प्रायः निर्मल एवं पावन होता है । इसके अतिरिक्त वास्तविक प्रेम को अभिव्यक्ति के निमित्त शब्दों की भी कोई आवश्यकता नहीं होती । वह स्वतः ही हृदय से हृदय तक जा पहुँचता है । पायल की झंकार में स्पष्ट है कि बालक गोपाल को बालिका श्यामा से प्रेम है । और फ़िल्म के एक दृश्य में जब गुरुपुत्री की पुत्री (गुरु की दौहित्री) को नदी में डूबने से बचाने के उपरांत श्यामा का गोपाल से संवाद होता है तो श्यामा भी उस प्रेम को भाँप जाती है । स्वयं श्यामा गोपाल के प्रति अपने हृदय में प्रच्छन्न उस प्रेम से अनभिज्ञ है जो उस समय प्रकट होता है जब गोपाल के आगमन एवं ढोल-वादन से उसके विरक्त भाव से किए जा रहे रसहीन नृत्य में ऐसी पुलक भर जाती है जैसी कभी कृष्ण की वंशी से राधा के नृत्य में भर जाती होगी । किन्तु इन दोनों का यह प्रेम निर्दोष है, निश्छल है और इसीलिए हृदय-विजयी है ।

माया गोविंद द्वारा रचित फ़िल्म के सभी गीत हिन्दी साहित्य की धरोहर-सदृश हैं जिन्हें शास्त्रीय रागों पर आधारित मधुर धुनों में राजकमल द्वारा ढाला गया है । सुलक्षणा पंडित, येसुदास, चंद्राणी मुखर्जी, आरती मुखर्जी, अलका याग्निक, आनंद कुमार तथा पुरुषोत्तम दास जलोटा के स्वरों में गूंजते हुए – देखो कान्हा नहीं मानत बतियां, सुर बिन ताल नहीं, जिन खोजा तिन पाइयां, झिरमिर-झिरमिर सावन आयो, कर सिंगार ऐसे चलत सुंदरी, सारी डाल दई मोपे रंग, थिरकत अंग लचकी झुकी झूमत, रामा पानी भरने जाऊं सा, कौन गली गए श्याम, जय माँ गंगा आदि गीत किसी भी सच्चे संगीत प्रेमी को सम्मोहित करने में सक्षम हैं । इनमें से मेरा अत्यंत प्रिय गीत जिन खोजा तिन पाइयां है जिसे मैं कितनी भी बार सुन लूं, मेरा जी नहीं भरता ।

फ़िल्म में श्यामा की केंद्रीय भूमिका कोमल महुवाकर ने निभाई है जिन्होंने अपने वास्तविक जीवन में नृत्य की शिक्षा स्वर्गीय लच्छू महाराज से प्राप्त की थी । इस फ़िल्म में उनके सम्पूर्ण नृत्यों का निर्देशन बद्री प्रसाद ने किया है । शास्त्रीय नृत्यों में उनकी निपुणता तो फ़िल्म के प्रत्येक नृत्य-आधारित दृश्य में परिलक्षित होती ही है, उनकी अभिनय प्रतिभा भी अपने सम्पूर्ण रूप में निखर कर आई है । इससे पहले वे कतिपय फिल्मों में बाल कलाकार के रूप में काम कर चुकी थीं । मुख्य भूमिका में इस अपनी पहली ही फ़िल्म में उन्होंने अत्यंत प्रभावशाली अभिनय किया है । और उनका भरपूर साथ निभाया है अलंकार जोशी ने । अलंकार भी इस फ़िल्म से पूर्व बाल कलाकार के रूप में स्थापित हो चुके थे । मूलतः कोमल की फ़िल्म होने के उपरांत भी अलंकार ने गोपाल की भूमिका में अपनी अमिट छाप छोड़ी है । अन्य कलाकारों में जहाँ किशन महाराज की भूमिका में अनुभवी चरित्र-अभिनेता अरूण कुमार ने प्राण फूंक दिए हैं, वहीं उनसे ईर्ष्या करने वाले नृत्य-गुरु दीनानाथ की भूमिका में हिन्दी के सुपरिचित हास्य-कवि शैल चतुर्वेदी कुछ अतिरेकपूर्ण रहे । अन्य सभी सहायक कलाकारों ने अपनी-अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है जिनमें नृत्यांगना वीणा देवी की भूमिका करने वाली नवोदित अभिनेत्री सुरिंदर कौर भी सम्मिलित हैं ।

फ़िल्म के कण-कण में सादगी व्याप्त है एवं कहीं पर भी धन एवं विलासिता का निर्लज्ज प्रदर्शन नहीं है । अभद्रता से सर्वथा मुक्त यह फ़िल्म सम्पूर्ण परिवार के साथ देखने योग्य है । दो घंटे से भी कम अवधि की इस छोटी-सी फ़िल्म को देखकर मेरे मन में जो विचार उठा, वह यह था कि यह फ़िल्म इतनी छोटी क्यों बनाई गई ? इसे तो लंबी होना चाहिए था । दूसरा विचार जो मेरे मन में एक हूक, एक कसक के साथ उभरा; वह यह था कि क्या ऐसे लोग, ऐसी गतिविधियां और ऐसा जीवन वास्तविक संसार में होना संभव नहीं ? वास्तविकता में क्यों हम इतने तमोगुणी एवं अधोमुखी हैं ? क्यों हम सच्चरित्र नहीं बन सकते ? क्यों आदर्श को यथार्थ में रूपायित नहीं किया जा सकता ?


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Sunday, August 27, 2017

कर्तव्य-पथ पर जो मिले . . .

'पूर्णा' फ़िल्म को कुछ मास पूर्व मैंने इंटरनेट पर देखा और यह फ़िल्म सीधे मेरे हृदय की गहनता में उतर गई । उसके उपरांत भी इस लेख को लिखने में असाधारण विलंब हुआ, संभवतः इसलिए कि एक उत्कृष्ट कृति के प्रति न्याय करने योग्य लेख लिखने के लिए मैं उद्यत नहीं हो पा रहा था । आज जब सहसा हृदय में हिलोर उठी कि इस लंबित कार्य को अवश्य पूर्ण करना है तो लेखनी भी सक्रिय हो उठी ।

भारत में ३१ मार्च, २०१७ को प्रदर्शित पूर्णा हिन्दी भाषा में निर्मित वह बहु-प्रशंसित फ़िल्म है जो कई अन्य भाषाओं में भी अनूदित हो चुकी है । यह तेलंगाना राज्य के पकाला ग्राम के निर्धन परिवार की कन्या पूर्णा मालावत की वास्तविक कहानी है जिसने २५ मई, २०१४ को मात्र तेरह वर्ष और ग्यारह मास की आयु में माउंट एवरेस्ट पर पहुँच कर तिरंगा लहराया और इस प्रकार विश्व के सर्वोच्च पर्वत शिखर पर विजय प्राप्त करने वाली सबसे कम आयु की पर्वतारोही बनने का कीर्तिमान स्थापित किया । वास्तविक पूर्णा अब उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही है जिसकी भूमिका इस फ़िल्म में अदिति इनामदार ने निभाई है ।  
इस फ़िल्म का (अमित पाटनी के साथ मिलकर) निर्माण तथा दिग्दर्शन राहुल बोस ने किया है जो अपने स्वाभाविक अभिनय तथा सार्थक सिनेमा में किए गए योगदान के लिए भारतीय फ़िल्म जगत में सम्मान की दृष्टि से देखे जाते हैं । फ़िल्म में पूर्णा के मार्गदर्शक तथा प्रतिपालक (मेंटर) आर.एस. प्रवीण कुमार (जो कि भारतीय पुलिस सेवा के एक वरिष्ठ अधिकारी हैं) की भूमिका उन्होंने स्वयं ही निभाई है ।
जहाँ तक फ़िल्म की गुणवत्ता का प्रश्न है, वह उत्कृष्ट है, इसमें कोई संदेह नहीं । आरंभ में प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के साथ प्रवीण कुमार के एक दृश्य जिसे फ़िल्म के अंतिम भाग में दोहराया भी गया है तथा एक-दो अतिरेकपूर्ण प्रसंगों को छोड़कर फ़िल्म अपने मुख्य स्वरूप में अत्यंत प्रभावशाली है । राहुल बोस ने न केवल स्वयं प्रवीण कुमार की भूमिका में प्राण फूंक दिए हैं, वरन उन्होंने प्रशांत पांडे तथा श्रेया देव वर्मा द्वारा लिखित पटकथा को अत्यंत स्वाभाविक एवं हृदयस्पर्शी रूप में रजतपट पर उतारा है । पूर्णा के जीवन के माध्यम से भारतीय ग्रामीण परिवेश में बालिकाओं के प्रति नितांत संवेदनशून्य पारंपरिक दृष्टिकोण को हृदयविदारक रूप में दर्शाती यह फ़िल्म अनेक स्थलों पर दर्शकों के नेत्रों को सजल कर देने में सक्षम है तथा कोई भी संवेदनशील व्यक्ति इसे देखकर भावुक हुए बिना नहीं रह सकता । राहुल बोस ने अत्यंत न्यून तापमान वाले वास्तविक पर्वतीय स्थलों में फ़िल्मांकन का साहसिक कार्य किया है जिसमें अभिनेताओं सहित उनके सम्पूर्ण कार्यदल ने अपना अमूल्य योगदान दिया है । इसके लिए ये सभी भूरि-भूरि प्रशंसा तथा अभिनंदन के अधिकारी हैं । शुभ्रांशु दास का छायांकन हो या मनन मेहता का सम्पादन या फिर अमिताभ भट्टाचार्य के मर्मस्पर्शी गीतों के लिए सलीम-सुलेमान द्वारा बनाई गई धुनें, सभी कुछ सराहनीय है ।

कास्टिंग निर्देशक मयंक दीक्षित ने केंद्रीय भूमिका के लिए अदिति इनामदार के रूप में सर्वोपयुक्त चयन किया है । अदिति ने वास्तविक पूर्णा को मानो चित्रपट पर जीवंत कर दिया है । पूर्णा की पूर्ण-अपूर्ण इच्छाएं, भावनाएं, घुटन और पीड़ाएं अदिति के हाव-भावों में साकार हो उठी हैं । पूर्णा की अभिन्न सखी तथा मूल-प्रेरणा प्रिया के रूप में एस. मारिया ने भी जो अभिनय किया है वह दर्शक के हृदय के तल तक पहुँच कर उसे स्पर्श कर लेता है । प्रवीण कुमार की भूमिका के साथ राहुल बोस से अधिक न्याय कोई अन्य कर ही नहीं सकता था । बाकी सभी कलाकार भी अपनी-अपनी भूमिकाओं में सहज स्वाभाविक हैं ।
बायोपिक (जीवनी) फिल्मों के इस दौर में पूर्णा अपना एक पृथक् स्थान रखती है क्योंकि यह उस संघर्षशील बालिका के अपने पीड़ादायी बाल्यकाल से अपनी असाधारण उपलब्धि की उस यात्रा को प्रस्तुत करती है जिसे वह समुचित प्रशंसा तथा प्रचार नहीं मिला जिसकी वह अधिकारिणी है । प्रत्येक छोटी-बड़ी बात का कोलाहल करने वाले संचार माध्यमों द्वारा भी इस प्रेरक गाथा की उपेक्षा ही की गई जिसकी क्षतिपूर्ति यह फ़िल्म करती है । और इसीलिए यह फ़िल्म भी उतनी ही असाधारण है जितनी कि असाधारण वह वास्तविक उपलब्धि है जो फ़िल्म का आधार है ।

इस अधिकांशतः वास्तविक घटनाक्रम एवं तथ्यों पर आधारित फ़िल्म को देखते समय (एवं देखने के उपरांत भी) मुझे यह लगा कि इसमें निरूपित गाथा पूर्णा मालावत नामक साहसी बालिका से भी अधिक आर.एस. प्रवीण कुमार नामक उस नौकरशाह की है जिसने प्रशासनिक सुख-सुविधाओं का लाभ उठाने तथा पदोन्नतियाँ ले-लेकर भारतीय पुलिस सेवा के (मलाईदार) उच्च पद पर पहुँचने के स्थान पर अपने जीवन को एक सार्थकता प्रदान करने का विकल्प चुना तथा अपना क्षेत्र परिवर्तित करके साधनहीन वर्ग से आने वाले बालकों को समुचित शिक्षा एवं उससे जुड़ी हुई स्वास्थ्य-संबंधी सुविधाएं मिलें, इसे सुनिश्चित करने के पावन लक्ष्य की ओर अपनी ऊर्जा को मोड़ दिया । उनका यह निर्णय अत्यंत साहसिक था, त्यागमय था, अभिनंदनीय था ।

अपनी युवावस्था में मैं स्वयं भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाना चाहता था एवं श्रीमती किरण बेदी नामक वास्तविक व्यक्तित्व को तथा दशकों पूर्व दूरदर्शन पर प्रसारित हुए उड़ान नामक धारावाहिक की काल्पनिक नायिका कल्याणी सिंह को अपना आदर्श मानकर परीक्षा की तैयारी करता था । लेकिन आज जब मैं भारतीय नौकरशाही के तौर-तरीकों एवं नज़रिये को बेहतर देख पा रहा हूँ तो कभी-कभी सोचता हूँ कि यदि मैं सचमुच ही प्रशासनिक सेवा में जाने के अपने लक्ष्य में सफल हो जाता तो क्या इस निहित स्वार्थों एवं अवरुद्ध-जल सरीखे दृष्टिकोण से आबद्ध इस भ्रष्ट, संवेदनहीन एवं निकम्मी व्यवस्था में मेरा दम नहीं घुट जाता ? ऐसे में जब इस फ़िल्म में मैंने प्रवीण कुमार को कालातीत ढंग से चलने वाली पाषाणी व्यवस्था से जूझकर भी अपने पावन लक्ष्य की ओर अग्रसर होते हुए देखा तो यह तथ्य मेरे हृदय को कहीं गहनता में जाकर स्पर्श कर गया एवं मेरा शीश इस दृढ़-संकल्पी व्यक्ति के आत्मविश्वास तथा इच्छाशक्ति के सम्मुख नत हो गया ।

जैसा कि फ़िल्म में भी राहुल बोस ने निरूपण किया है – प्रवीण कुमार का पथ कंटकाकीर्ण ही रहा होगा, सत्य के पथिक को तो अपने पथ के पुष्पाच्छादित होने की अपेक्षा करनी भी नहीं चाहिए । अपने सफ़र की शुरूआत में वे लगभग अकेले ही थे लेकिन जैसा कि मजरूह सुल्तानपुरी साहब का कालजयी शेर है – मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल; लोग आते गए, कारवाँ बनता गया– उन्हें भी साथ देने वाले हमख़याल लोग मिल ही गए । पूर्णा फ़िल्म की टैगलाइन है – करेज हैज़ नो लिमिट (साहस की कोई सीमा नहीं होती है) । यह बात निर्धन एवं अशिक्षित परिवार से आने वाली आदिवासी बालिका पूर्णा मालावत के साथ-साथ प्रवीण कुमार पर भी लागू है । पूर्णा की अद्भुत सफलता प्रवीण कुमार की दीर्घ यात्रा का एक पड़ाव मात्र है, ऐसे न जाने कितने ही पड़ाव उनकी प्रतीक्षा कर रहे होंगे । प्रवीण कुमार ने संभवतः इन पंक्तियों को अपने जीवन में आत्मसात् कर लिया है – क्या हार से क्या जीत से, किंचित नहीं भयभीत मैं; कर्तव्य-पथ पर जो मिले, ये भी सही, वो भी सही

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Sunday, April 30, 2017

वे सदा अपने प्रति ईमानदार रहे

हिन्दी फ़िल्मों के अत्यंत लोकप्रिय नायक तथा सांसद विनोद खन्ना के अस्वस्थ होने की बात विगत लंबे समय से सुनी जा रही थी  । तथापि उनके देहावसान के समाचार ने मुझे स्तब्ध कर दिया । जैसा कि स्वाभाविक ही है, उनके ऊपर कई श्रद्धांजलियाँ लिखी जा चुकी हैं जो प्रकाशित तथा आभासी दोनों ही संसारों में स्थान-स्थान पर बिखरी पड़ी हैं । लेकिन उनके जीवन और व्यक्तित्व पर सर्वाधिक उपयुक्त टिप्पणी मुझे माधुरी नामक लेखिका के इंटरनेट पर डाले गए आलेख के शीर्षक में मिली जो वस्तुतः प्रसिद्ध शायर बशीर बद्र साहब की एक ग़ज़ल के एक शेर से लिया गया है – ‘मुहब्बत अदावत वफ़ा बेरुख़ी; किराये के घर थे, बदलते रहे’ । विनोद खन्ना का जीवन सचमुच ऐसा ही गुज़रा । लेकिन उन्होंने ज़िंदगी से कभी कोई शिकवा नहीं किया । वह जैसी उन्हें मिली, उन्होंने उसे वैसे ही जिया और भरपूर जिया । उनकी ज़िन्दगी की तहें जैसे-जैसे उनके सामने खुलती गईं, वे उन्हें वैसे-वैसे ही अपनाते गए बिना किसी अंतर्बाधा के, बिना किसी अपराध-बोध के; सदा अपने कर्तव्य का निर्धारण अपने विवेक-बल से करते हुए ।
पेशावर में जन्मे विनोद खन्ना विभाजन के उपरांत दिल्ली आ बसे एक पंजाबी व्यवसायी के पुत्र थे । पिता नहीं चाहते थे कि वे फ़िल्मी दुनिया का रुख़ करें लेकिन अपने मन में अभिनेता बनने की लगन लगा बैठे विनोद जा पहुँचे बंबई । उनकी प्रबल इच्छाशक्ति ने ही मानो प्रारब्ध का रूप धरकर उन्हें अनायास ही मिलवा दिया बॉलीवुड के चोटी के नायक और निर्माता सुनील दत्त से जो अपने भाई सोम दत्त को नायक के रूप में हिन्दी फ़िल्मों में स्थापित करने के निमित्त एक फ़िल्म बनाने की योजना पर काम कर रहे थे । विनोद खन्ना के रूप में उन्हें अपनी फ़िल्म का खलनायक मिल गया । फ़िल्म थी मन का मीत (१९६९) जो कि उसकी नायिका लीना चंदावरकर की भी पहली फ़िल्म ही थी । भाग्य को यही स्वीकार्य था कि वह फ़िल्म सोम दत्त के नहीं, विनोद खन्ना के करियर की आधारशिला बने । सोम दत्त की तो वह प्रथम फ़िल्म ही उनकी अंतिम फ़िल्म भी सिद्ध हुई लेकिन विनोद खन्ना के करियर रूपी वाहन को राजपथ मिल गया । अपनी प्रारम्भिक कुछ फ़िल्मों में वे खलनायक ही बने लेकिन इतने आकर्षक और प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले युवक को खलनायक के रूप में कब तक प्रस्तुत किया जा सकता था ? उन्हें नायक ही बनना था और अंततः वे नायक ही बने । लेकिन इससे पूर्व उन्होंने मेरा गाँव मेरा देश (१९७१) में डाकू जब्बर सिंह की यादगार भूमिका निभाई । यही कथानक कुछ वर्षों के उपरांत सर्वकालीन सफलतम हिन्दी फ़िल्म शोले (१९७५) में सामने आया जिसमें डाकू का नाम जब्बर सिंह के स्थान पर गब्बर सिंह कर दिया गया ।

नायक के रूप में विनोद खन्ना की प्रथम फ़िल्म थी हम तुम और वो (१९७१) जिसके शुद्ध संस्कृतनिष्ठ हिन्दी में रचित प्रेम गीत – प्रिय प्राणेश्वरी, हृदयेश्वरी के शब्द तथा उन पर विनोद खन्ना का अभिनय दोनों ही आज भी देखने वालों के हृदय को गुदगुदा देते हैं । पुरुषोचित सौन्दर्य से युक्त अपने अत्यंत आकर्षक व्यक्तित्व तथा अभिनय-प्रतिभा के कारण विनोद खन्ना नायक के रूप में अपने खलनायक रूप से कई गुना अधिक सफल रहे । उन दिनों दस्युओं की कथाओं पर बहुत फ़िल्में बनती थीं और उस दौर में दस्यु की भूमिका में विनोद खन्ना से अधिक प्रभावशाली और कोई नहीं लगता था । मेरा गाँव मेरा देश (१९७१), ‘कच्चे धागे (१९७३), ‘शंकर शंभू (१९७६), ‘हत्यारा (१९७७) और राजपूत (१९८२) जैसी फ़िल्में इस बात का प्रमाण हैं ।

अधिकांशतः मुख्यधारा की फ़िल्में करने के बावजूद विनोद खन्ना ने कई परिपाटी से हटकर बनाई गई सार्थक फ़िल्में भी कीं । असाधारण साहित्यकार और कवि गुलज़ार ने जब फ़िल्म बनाने का निश्चय किया तो बेरोज़गार युवाओं की भटकन के विषय पर आधारित अपनी फ़िल्म मेरे अपने(१९७१) में विनोद खन्ना को एक प्रमुख भूमिका में लिया । और पच्चीस वर्षीय विनोद खन्ना ने इस उत्कृष्ट फ़िल्म में अपने यादगार अभिनय से सिद्ध कर दिया कि न तो उनमें प्रतिभा का अभाव था और न ही कार्य एवं कला के प्रति समर्पण-भाव का । जिन लोगों ने इस फ़िल्म में विनोद खन्ना को कोई होता जिसको अपना हम अपना कह लेते यारों गाते हुए देखा है, वे इस तथ्य के साक्षी हैं कि इस अमर गीत को गा रहे स्वर्गीय किशोर कुमार के स्वर में अंतर्निहित खंडित मन और एकाकीपन की पीड़ा को विनोद खन्ना ने चित्रपट पर साकार कर दिया है । उन्हें देखकर ऐसा लगता है मानो वे उस निभाए जा रहे चरित्र में उतरकर उसकी पीड़ा को स्वयं अनुभव कर रहे हों । लगभग यही स्थिति वर्षों बाद ऋषि कपूर और श्रीदेवी अभिनीत यश चोपड़ा की फ़िल्म चाँदनी (१९८९) के गीत लगी आज सावन की फिर वो झड़ी है में भी मिलती है जिसे गाया तो सुरेश वाडकर ने लेकिन शब्दों और सुरों से प्रतिध्वनित होती पीड़ा को अपने हाव-भावों में प्रतिबिम्बित किया विनोद खन्ना ने ।


एक बार गुलज़ार साहब के साथ काम कर लेने के उपरांत विनोद खन्ना उनके प्रिय अभिनेता बन गए और गुलज़ार साहब ने अपनी अनेक फ़िल्मों में उन्हें लिया । ऐसी सभी फ़िल्मों में जो कि फ़ॉर्मूलाबद्ध न होकर कुछ भिन्न रंग लिए हुए थीं, विनोद खन्ना ने अपनी अमिट छाप छोड़ी । मुख्यधारा की प्रेम एवं अपराध आधारित फ़िल्मों में भी उन्होंने लीक से हटकर भूमिकाएँ कीं यथा इनकार (१९७७) एवं लहू के दो रंग (१९७९) । इस संदर्भ में इम्तिहान (१९७४) का नाम उल्लेखनीय है जिसमें उन्होंने एक आदर्शवादी प्राध्यापक की भूमिका निभाई है । हिन्दी सिनेमा में सत्तर का दशक केवल तथाकथित सदी के महानायक अमिताभ बच्चन का ही नहीं, विनोद खन्ना का भी था । उस युग में अमिताभ बच्चन की अनेक फ़िल्मों की सफलता में विनोद खन्ना का भी बराबर का योगदान था और अमिताभ बच्चन की शिखर स्थिति को चुनौती देने वाला उन्हीं को माना जाता था । विनोद खन्ना ने अनेक बहुसितारा फ़िल्मों में भी काम किया लेकिन कई नायकों के मध्य रहकर भी उन्होंने किसी भी फ़िल्म में अपनी पहचान को खोने नहीं दिया । साहसी महिला फ़िल्मकार अरुणा राजे ने अपने पति विकास के साथ मिलकर (अरुणा-विकास के संयुक्त नाम से) पत्नी की स्वतंत्र सोच को दर्शाने वाली फ़िल्म शक़ (१९७६) बनाई तो उसमें उन्होंने शबाना आज़मी के साथ विनोद खन्ना को लिया और एक दशक से अधिक अवधि के उपरांत जब अकेले ही अत्यंत दुस्साहसी फ़िल्म रिहाई (१९८८) बनाई तो उसमें भी हेमा मालिनी के साथ विनोद खन्ना को ही लिया । इन नायिका प्रधान फ़िल्मों में भी विनोद खन्ना ने निस्संकोच काम किया और स्वयं को दिए गए चरित्रों के साथ पूरा न्याय किया ।


फ़िरोज़ ख़ान निर्मित क़ुरबानी (१९८०) की देशव्यापी सफलता ने विनोद खन्ना को सफलता के शिखर पर पहुँचा दिया । लेकिन तब उन्होंने वह कार्य किया जिसे करने की बात सोचना तक किसी भी सफल व्यक्ति के लिए कठिन है । मैंने अपने लेख सफलता बनाम गुण में लिखा है कि सफल व्यक्तियों की सोच प्रायः यह होती है कि सफलता के लिए कुछ भी त्यागा जा सकता है लेकिन किसी भी बात के लिए सफलता को दांव पर नहीं लगाया जा सकता । विनोद खन्ना ने स्वयं को अपवाद सिद्ध करते हुए १९८२ में फ़िल्मी दुनिया की चकाचौंध और उससे जुड़ी भौतिक सफलता एवं लोकप्रियता से किनारा कर लिया तथा आचार्य रजनीश (ओशो) के आश्रम में चले गए जो कि रजनीशपुरम (अमरीका) में था । मात्र ३६ वर्ष की आयु में भरपूर यौवन, धन-सम्पदा, सफलता, लोकप्रियता तथा परिवार के होते हुए भी सभी सुखों से पीठ फेरकर अध्यात्म की ओर उन्मुख हो जाने का असाधारण निर्णय एक असाधारण व्यक्ति ही ले सकता है । विनोद खन्ना सचमुच असाधारण ही थे जो सफलता का मोह छोड़ सके, उसके नशे से बाहर आ सके । उन्होंने अपने हृदय की पुकार सुनी और उसी के आधार पर निर्णय लेकर अपनी जीवन-यात्रा को एक नया मोड़ दे दिया । उन्होंने अपने इस निर्णय का बहुत बड़ा मूल्य अपनी पत्नी और अपने दो पुत्रों की माता गीतांजलि के साथ विवाह-विच्छेद के रूप में चुकाया । लेकिन संभवतः उन्होंने इन पंक्तियों को अपने व्यक्तित्व में आत्मसात् कर लिया था – क्या हार में क्या जीत में, किंचित नहीं भयभीत मैं; संघर्ष-पथ पर जो मिले, ये भी सही, वो भी सही । आश्रम में रहते हुए उन्होंने बरतन तक माँजे । लेकिन इस सरल-चित्त तथा अहंकार से मुक्त असाधारण पुरुष के लिए यह भी एक सामान्य बात ही थी ।


पाँच वर्ष तक स्वामी विनोद भारती के नाम से आचार्य रजनीश के सान्निध्य में रहने के उपरांत उनका मन पुनः सांसारिक कर्तव्य-पथ की ओर मुड़ा । वे रजनीश के प्रिय शिष्य थे, अतः स्वाभाविक रूप से रजनीश ने उनसे उनके साथ ही रहने तथा उनके कार्यकलापों में हाथ बंटाने के लिए कहा लेकिन विनोद ने उन्हें अत्यंत स्वाभाविक और सच्चा उत्तर दिया – अपने गुरु के साथ मेरी यात्रा यहीं तक थी । जीवन को सदा बहती धारा के रूप में देखने वाले विनोद जैसे पहले बंबई के फ़िल्म संसार में नहीं रुके थे, वैसे ही अब आश्रम के आध्यात्मिक संसार में भी नहीं रुके और अपने पुराने कर्मपथ पर लौट आए । लेकिन पाँच वर्ष के अंतराल के पश्चात् लौटने पर उनके पास अब न पूर्व में अर्जित सफलता थी, न संसाधन, न अर्द्धांगिनी । लेकिन कभी मन न हारने वाले विनोद खन्ना ने सम्पूर्ण साहस और आत्मविश्वास के साथ अपने भाग्य से पंजा लड़ाया और स्वयं को पुनः एक सफल नायक के रूप में स्थापित कर दिखाया । लौटते ही उन्होंने सत्यमेव जयते(१९८७) जैसी सार्थक फ़िल्म की जो कि न केवल व्यावसायिक रूप से सफल रही वरन उसकी चहुँओर प्रशंसा भी हुई । कुछ ही समय के उपरांत लोग उनके लिए कहने लगे कि जब वे गए थे, तब भी नंबर दो पर थे और जब लौटे भी तो सीधे नंबर दो पर ही लौटे । वापसी के उपरांत उन्होंने गुलज़ार साहब की मर्मस्पर्शी फ़िल्म लेकिन (१९९१) में भी प्रभावशाली भूमिका की । इस फ़िल्म में उन पर फ़िल्माए गए सुमधुर गीत सुरमई शाम इस तरह आए (जिसे सुरेश वाडकर ने गाया और हृदयनाथ मंगेशकर ने संगीतबद्ध किया है) को देखना एक अवर्णनीय अनुभव है ।

विनोद खन्ना ने अपने जीवन को सदा अपनी शर्तों पर जिया लेकिन अपने कर्तव्यों से कभी मुँह नहीं मोड़ा । इस तथ्य को उनकी प्रथम पत्नी से उत्पन्न पुत्र भी स्वीकार करते हैं । द्वितीय विवाह कर लेने के उपरांत भी उन्हें अपने प्रथम विवाह की संतानों के प्रति अपने कर्तव्य का सदा स्मरण रहा । उनके ज्येष्ठ पुत्र राहुल ने मुख्यधारा से पृथक् रहकर बनाई गई फ़िल्मों में प्रवेश किया जबकि कनिष्ठ पुत्र अक्षय के लिए उन्होंने स्वयं हिमालय पुत्र (१९९७) नामक फ़िल्म का निर्माण किया जिसमें उन्होंने अक्षय के पिता की भूमिका स्वयं ही निभाई । फ़िल्म व्यावसायिक रूप से असफल रही किन्तु अक्षय नायक के रूप में फ़िल्मों में स्थापित हो गए । 


वार्धक्य के साथ विनोद खन्ना अपनी आयु से सामंजस्य रखती भूमिकाओं की ओर मुड़े लेकिन तभी नियति ने उनके लिए एक और मार्ग प्रस्तुत किया । उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया तथा गुरदासपुर लोक सभा क्षेत्र से चार बार निर्वाचित हुए । वे केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में मंत्री भी बने । जब एक बार उन्होंने चुनावी सभा को संबोधित करते हुए कहा था, ‘सानू गुरदासपुर नूं पेरिस बना दवांगा (मैं गुरदासपुर को पेरिस बना दूंगा) तो मैंने उनका उपहास किया था लेकिन आज मुझे लगता है कि वे किसी आदी झूठे भारतीय राजनेता की तरह नहीं बोल रहे थे बल्कि वही कह रहे थे जो वे करना चाहते थे और समझते थे कि कर सकते थे । इसका कारण यह है कि वे अपने जीवन में झूठ और पाखंड से सदा दूर रहे । २००४ में केंद्र में सत्ता-परिवर्तन हो जाने के कारण वे मंत्री नहीं रहे और बाद के वर्षों में उनका स्वास्थ्य गिरने लगा । संभवतः सीलिए वे जनाकांक्षाओं की पूर्ति और उनसे जुड़ी अपने मंशाओं पर भलीभाँति अमल नहीं कर सके । इसके अतिरिक्त सांसद और मंत्री बनने के उपरांत भी उन्होंने फ़िल्मों में काम करना नहीं छोड़ा जिसका कारण उन्होंने सार्वजनिक रूप से बिना किसी लागलपेट के सम्पूर्ण ईमानदारी के साथ यह बताया था, ‘मेरी शानोशौकत की ज़िन्दगी है जिसके लिए पैसा चाहिए और पैसा केवल फ़िल्मों से मिल सकता है । सांसद और मंत्री के रूप में तो जो पैसा मुझे मिलता है उससे गाड़ियों के पेट्रोल तक का खर्च चलना मुहाल है । यह उनके अपने प्रति ईमानदार होने का सबसे बड़ा प्रमाण था । न तो वे लोकदिखावे के लिए तथाकथित सादगी को ओढ़ना चाहते थे और न ही भ्रष्ट साधनों से कमाना चाहते थे । इसीलिए जब तक संभव हुआ, वे फ़िल्मों में काम करते रहे ।

पत्नी गीतांजलि से संबंध-विच्छेद के उपरांत विनोद खन्ना के एकाकी जीवन में उनके प्रारब्ध ने तब पुनः हस्तक्षेप किया जब उनकी भेंट कविता नामक युवती से हुई । आयु में बहुत अंतर होने के उपरांत भी और बॉलीवुड फ़िल्मों में विशेष रुचि न होने पर भी कविता ने उनके विवाह-प्रस्ताव को स्वीकार किया और विवाह के उपरांत न केवल उनके अकेलेपन को बाँटा वरन उनके प्रत्येक कार्य में उनकी सहयोगिनी और वास्तविक अर्थों में उनकी अर्द्धांगिनी बनकर दिखाया । संभवतः यही प्रारब्ध है जिसने दोनों का मिलना और जीवन साथी बनना पहले ही निर्धारित कर दिया था । कविता ने विनोद खन्ना को उनके जीवन के कठिन दौर में भावनात्मक संबल दिया और उनकी पत्नी के रूप में  साक्षी नामक पुत्र तथा श्रद्धा नामक पुत्री को जन्म दिया । विनोद खन्ना ने अपने दोनों विवाहों से विकसित परिवार को किस तरह एकजुट रखा, यह इसी से सिद्ध होता है कि दो बड़े पुत्रों के उपस्थित होते हुए भी उनकी अंतिम क्रिया उनके दूसरे विवाह से उत्पन्न पुत्र साक्षी ने की ।

कविता को विनोद से एकमात्र शिकायत सदा रही कि वे अपना अधिक समय ध्यान (मेडिटेशन) को दिया करते थे, उन्हें नहीं । लेकिन वर्षों तक अध्यात्म से जुड़े रहे विनोद ध्यान को आत्मिक शांति के लिए अत्यावश्यक मानते थे । इसी से उन्हें सदा आंतरिक शक्ति प्राप्त होती थी जो उन्हें विपरीत परिस्थितियों से जूझने का साहस देती थी । वस्तुतः यही वह आत्मबल था जिसने पहले उन्हें शोबिज़ की चमकीली दुनिया और उसमें मिली कामयाबी की चकाचौंध को छोड़ जाने का हौसला दिया और कुछ अरसे बाद फिर से वहीं लौटकर एक नई शुरूआत करने की भी हिम्मत और ताक़त दी । भौतिक सफलता, लोकप्रियता और सुख-सुविधाओं का आनंद उठा रहे कितने लोग ऐसा साहस कर सकते हैं और अपने आपको चुनौती दे सकते हैं ?

उनके पुत्र अक्षय ने एक बार अपने पिता के संन्यासी होकर रजनीश के आश्रम में चले जाने के निर्णय का समर्थन करते हुए कहा था कि उन्होंने अपनी ख़ुशी को चुना और अगर आप ख़ुद ख़ुश नहीं हैं तो दूसरों को भी ख़ुश नहीं रख सकते । इस कथन ने मुझे स्वर्गीय वेदप्रकाश शर्मा के उपन्यास शिखंडीके एक संवाद का स्मरण करवा दिया – स्वयं को पीछे रखकर किसी और के विषय में सोचना मृगतृष्णा होती है। पूर्णतः उचित बात कही है शर्मा जी ने क्योंकि आत्म-विकास करके ही मनुष्य स्वयं को परहित के निमित्त सक्षम बना सकता है, स्वयं की उपेक्षा करके कदापि नहीं  । विनोद खन्ना ने इस सत्य को समझा एवं आत्मसात् किया । उन्हें आजीवन किसी का भय नहीं रहा क्योंकि वे सदा अपने प्रति ईमानदार रहे । अपने साथी कलाकारों द्वारा सदा एक भद्रपुरुष (जेंटलमैन) के रूप में देखे गए विनोद खन्ना अपने जीवन को अपनी शर्तों पर अपने ढंग से पूर्ण संतोष के साथ इसीलिए व्यतीत कर पाए क्योंकि वे उसका मूल्य चुकाने से कभी नहीं कतराए ।

विनोद खन्ना के जीवन-दर्शन को उनकी फ़िल्म कुदरत (१९८१) में उन्हीं पर फ़िल्माए गए इस गीत के बोलों से समझा जा सकता है – छोड़ो सनम, काहे का ग़म, हँसते रहो, खिलते रहोऔर अपने जीवन के उच्चावचनों से गुज़रते हुए संभवतः वे इम्तिहान(१९७४) में स्वयं पर ही फ़िल्माए गए इस कालजयी गीत के बोलों से प्रेरणा और ऊर्जा प्राप्त करते रहे - रुक जाना नहीं तू कहीं हार के, काँटों पर चल के मिलेंगे साये बहार के, ओ राही ओ राही . . .

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Sunday, March 12, 2017

रहस्य-रोमांच और भावनाओं के चितेरे को श्रद्धांजलि

जब पता चला कि हिन्दी उपन्यासकार वेदप्रकाश शर्मा नहीं रहे तो मन में कहीं एक हूक-सी उठी और शीश एक बार पुनः नियति की शक्ति के सम्मुख नत हो गया । तीन दिसंबर, २०१६ को एक विवाह समारोह में अपने मेरठ स्थित संबंधियों से मैंने कहा था कि मैं अपने प्रिय लेखक वेदप्रकाश शर्मा से भेंट करने की वर्षों पुरानी कामना पूर्ण करने के लिए अतिशीघ्र ही मेरठ आना चाहता था । और बमुश्किल ढाई माह बाद ही समाचारपत्र में पढ़ा कि १७ फ़रवरी, २०१७ को वेद जी नहीं रहे । अब उनसे मिलने की चाह तो अधूरी ही रहेगी लेकिन उनके निधन के उपरांत उनके कृतित्व पर छिड़ी चर्चाओं की धूल बैठ जाने के उपरांत मैं उनसे जुड़ी अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त कर रहा हूँ । 
एक समय में लुगदी साहित्य के नाम से जाने जाने वाले अल्पमोली उपन्यासों के संसार के सिरमौर रहे वेदप्रकाश शर्मा मुख्यतः एक रहस्य-रोमांच पर आधारित कथाओं के लेखक के रूप में पहचाने गए और उसी रूप में उन्हें कामयाबी और शोहरत नसीब हुई लेकिन उनकी लेखनी सामाजिक विडंबनाओं तथा देशप्रेम से भी जुड़ी रही । संभवतः अपने लेखन के प्रारम्भिक वर्षों में कई सामाजिक उपन्यास भी लिखने के कारण ऐसा रहा । बहरहाल कारण चाहे जो भी रहा हो, वेदप्रकाश शर्मा ने तीन दशक से अधिक समय तक पाठकों को ऐसे मनोरंजक कथानक परोसे जिनका मूल तत्व तो रहस्य-रोमांच था किन्तु कथ्य में सामाजिकता की भी छाप थी । यद्यपि उनके कई उपन्यास स्पष्टतः विदेशी कथानकों से प्रेरित थे लेकिन उन्होंने उन्हें भारतीय परिवेश एवं परिप्रेक्ष्य में अत्यंत प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया । उदारीकरण का युग आने से पूर्व भारतीय युवा देशप्रेम और जीवन के आदर्शों से भी ओतप्रोत रहते थे तथा अस्त्र-शस्त्रों की सहायता से देश की स्वतंत्रता के लिए रक्तिम संघर्ष करने वाले बलिदानी क्रांतिकारियों की जीवन-गाथाएं उन्हें आकर्षित करती थीं । वेदप्रकाश शर्मा ने ठेठ भारतीय हिन्दी पाठक समुदाय की इस नब्ज़ को बखूबी पकड़ा और देशप्रेम की चाशनी में डूबे रहस्य-रोमांच से भरपूर कई उपन्यास लिखे जिनमें खलनायक स्वाभाविक रूप से भारत को दास बनाकर बैठे अंग्रेज़ शासक ही होते थे । जहाँ इंक़लाब ज़िंदाबाद नामक उपन्यास में उन्होंने झांसी की रानी लक्ष्मीबाई के दत्तक पुत्र दामोदर की कल्पित कथा प्रस्तुत की वहीं अपने आदर्श सुभाषचंद्र बोस को ही एक पात्र के रूप में प्रस्तुत करते हुए उन्होंने वतन की कसम’, ‘खून दो आज़ादी लो’, ‘बिच्छू’, ‘जयहिंद और वन्देमातरम जैसे उपन्यास रचे जो रोचक भी थे और प्रेरक भी । सुभाष बाबू के जीवन-चरित से वे बहुत अधिक प्रभावित थे, यह बात उनके इन उपन्यासों में स्पष्टतः परिलक्षित होती है । विकास, केशव पंडित और विभा जिंदल जैसे अत्यंत लोकप्रिय पात्रों को सृजित करने वाले भी वे रहे जिनके कारनामों के माध्यम से उन्होंने आम जनता को अपने उपन्यासों से जोड़ा और जनसामान्य की दमित भावनाओं को अपने लेखनी के माध्यम से अभिव्यक्ति दी । अस्सी के दशक में हिन्दी के ऐसे असंख्य पाठक थे जो मेरठ वाले वेदप्रकाश शर्मा के अतिरिक्त (पॉकेट बुक लिखने वाले) किसी अन्य हिन्दी लेखक के उपन्यास पढ़ना पसंद नहीं करते थे । उनके लेखन का वह स्वर्णकाल था जब अपनी लेखनी के माध्यम से वे विशाल हिन्दी-भाषी समुदाय के मानस में घुसपैठ कर बैठे थे । 


वेदप्रकाश शर्मा ने अपनी विभा जिंदल सीरीज़ के उपन्यासों में स्वयं को तथा अपने परिवार के सदस्यों को भी पात्रों के रूप में प्रस्तुत किया । मुझे उनकी यह बात बहुत पसंद आई कि ऐसे प्रत्येक उपन्यास के पात्र के रूप में पाठकों के समक्ष वे एक सामान्य व्यक्ति बनकर ही आए, कोई असाधारण प्रतिभाशाली व्यक्ति या अतिमानव बनकर नहीं । इन उपन्यासों में उनकी अर्द्धांगिनी मधु भी चित्रित हुईं । वेदप्रकाश शर्मा उन भाग्यशाली लोगों में से एक रहे जिनके प्रेम को विवाह का गंतव्य प्राप्त हुआ । उनकी प्रेयसी मधु ही अंततः उनके जीवन में पत्नी बनकर आईं एवं उनके लिए प्रेरणा एवं शक्ति की अजस्र धारा बनकर सदा उनके जीवन-क्षेत्र में बहती रहीं । पहले एक उपन्यासकार, तदोपरांत एक प्रकाशक एवं तदोपरांत एक फ़िल्मी लेखक जैसे सभी रूपों में वेदप्रकाश शर्मा के मनोबल को मधु ने एक सच्ची जीवन-संगिनी होने का प्रमाण देते हुए सदा ऊंचा उठाए रखा एवं उनके उत्तरोत्तर सफलता के पथ पर अग्रसर होने में महती भूमिका निभाई । एक लेखक के रूप में वेदप्रकाश शर्मा को जिस मानसिक शांति की आवश्यकता थी, वह उन्हें मधु के द्वारा सदा उपलब्ध रही । इस तथ्य को उन्होंने कुछ उपन्यासों में जोड़े गए अपने आत्म-कथ्य में रेखांकित किया है । प्रत्येक सफल पुरुष के पीछे एक स्त्री होती है । अपने आरंभिक जीवन में आर्थिक कठिनाइयों से जूझने वाले तथा अत्यंत संघर्ष करने के उपरांत ही सफलता के लक्ष्य को प्राप्त करने वाले वेदप्रकाश शर्मा के अपने आत्म-कथ्य के आधार पर यह कहा जा सकता है कि उनकी माताजी के अतिरिक्त उनकी अर्द्धांगिनी मधु ही वह स्त्री रहीं जिसने विपरीत परिस्थितियों में भी कभी उनके मनोबल को टूटने नहीं दिया ।

वेदप्रकाश शर्मा का व्यावसायिक दृष्टि से सर्वाधिक सफल एवं बहुचर्चित उपन्यास वर्दी वाला गुंडा को माना जाता है जो कहने को तो पुलिस विभाग के भ्रष्टाचार पर टिप्पणी करता था लेकिन जो वस्तुतः श्रीपेरुंबूदुर में श्रीलंका के लिट्टे संगठन द्वारा स्वर्गीय राजीव गाँधी की हत्या के विषय पर आधारित था । वर्दी वाला गुंडा के भरपूर प्रचार पर वेदप्रकाश शर्मा ने जो व्यय किया होगा उसकी उन्होंने पाठकों से भरपूर वसूली की । १९९२ में प्रकाशित इस उपन्यास की सफलता को वे अपने सम्पूर्ण जीवनपर्यंत भुनाते रहे तथा प्रथम संस्करण के उपरांत उसके सभी संस्करण उसे दो भागों में बांटकर प्रकाशित किए गए और इस प्रकार पाठकों की ज़ेब से दोहरा मूल्य खींचकर दोगुना लाभ कमाया गया । उपन्यास की लोकप्रियता के शोर में किसी का भी ध्यान इस बात पर नहीं गया  कि जिस उपन्यास का वर्षों से प्रचार किया जा रहा था, वह वस्तुतः राजीव गाँधी की हत्या के उपरांत आनन-फानन लिखा गया था । मेरा अपना विचार यह है कि वर्दी वाला गुंडा वस्तुतः नाम का हिटलर नामक वही उपन्यास था जो वेदप्रकाश शर्मा वर्षों पूर्व मनोज पॉकेट बुक्स नामक प्रकाशन संस्था के लिए लिखने वाले थे लेकिन उससे अपने व्यावसायिक संबंध टूट जाने के कारण उन्होंने उसी कथानक को तुलसी पब्लिकेशन्स के नाम से आरंभ किए गए अपने ही प्रकाशन संस्थान हेतु रचित वर्दी वाला गुंडा में प्रस्तुत कर दिया तथा पूर्व-प्रधानमंत्री की हत्या को भुनाने के लिए वास्तविक लेखन के समय कथानक में उसी घटना को कुछ ऐसे पिरो दिया कि पढ़ने वाले भांप ही नहीं सके कि इस बहुप्रचारित उपन्यास का मूल कथानक कुछ और रहा होगा । 
वेदप्रकाश शर्मा अपने समकालीन गुप्तचरी उपन्यासकारों से इस रूप में भिन्न रहे कि उन्होंने सामाजिक तथा देशप्रेम की पृष्ठभूमि वाले अपने अनेक उपन्यासों में नारी पात्रों को न केवल यथेष्ट सम्मान दिया वरन उन्हें महिमामंडित करने की सीमा तक जा पहुँचे । सत्तर, अस्सी एवं नब्बे के दशक में जासूसी उपन्यासों को महिला पाठकों द्वारा प्रायः नापसंद किए जाने का प्रमुख कारण ही यही था कि ऐसे उपन्यासों में (जो कि अधिकांशतः विदेशी कथानकों पर आधारित होते थे) नारी पात्रों को उपभोग की वस्तु के रूप में ही प्रस्तुत किया जाता था एवं उनका चरित्रांकन अपमानजनक ढंग से किया जाता था । वेदप्रकाश शर्मा ने इस अवांछित परंपरा को तोड़ा और इसीलिए उनके उपन्यास महिलाओं में भी उतने ही लोकप्रिय हुए जितने कि वे पुरुष वर्ग में थे । गुप्तचरी उपन्यास लिखने वाले वेदप्रकाश शर्मा भावनाओं के भी कुशल चितेरे थे और अपने इस कौशल का उपयोग उन्होंने अपने कई उपन्यासों में नारी पात्रों तथा मानवीय सम्बन्धों से जुड़े विभिन्न प्रसंगों में किया । ऐसे कई प्रसंग संवेदनशील पाठकों को भावुक कर देने ही नहीं, रुला देने के लिए भी पर्याप्त रहे ।

लेकिन जिस तथ्य ने वेदप्रकाश शर्मा की अन्य उपन्यासकारों से इतर, और बेहतर, छवि गढ़ी; वह यह था कि उन्होंने अपने उपन्यासों के कथानकों में न केवल नवीनता उत्पन्न की और विविध विषयों पर अपनी लेखनी चलाई वरन सम-सामयिक समस्याओं एवं घटनाओं को भी अपने उपन्यासों के माध्यम से छुआ । नस्लभेद से उपजी आतंकवाद की समस्या पर उन्होंने माँग में अंगारे नामक प्रेरक उपन्यास लिखा तो मादक पदार्थों की समस्या पर जुर्म की माँ और कुबड़ा नामक दो भागों में बंटा एक अत्यंत प्रभावशाली वृहत् कथानक प्रस्तुत किया । लेकिन उनका सबसे बड़ा योगदान भारतीय समाज में व्याप्त दहेज रूपी कुरीति के संदर्भ में रहा जिसे केंद्र में रखकर उन्होंने तीन भिन्न कथानक रचे जिनमें से प्रत्येक में उन्होंने समस्या का एक भिन्न आयाम प्रस्तुत किया । अस्सी के दशक में दहेज के लिए प्रताड़ित की जाने वाली (एवं जला डाली जाने वाली) बहुओं की कहानियाँ समाचारपत्रों की आए दिन की सुर्खियाँ हुआ करती थीं । ऐसी ही एक बहू और उसके ससुराल की हौलनाक गाथा वेदप्रकाश शर्मा ने लिखी बहू मांगे इंसाफ़ में । यह उपन्यास न केवल अत्यंत लोकप्रिय हुआ वरन इसके आधार पर बहू की आवाज़ (१९८५) नामक फ़िल्म भी बनाई गई । लेकिन कुछ काल के उपरांत वेदप्रकाश शर्मा ने दुल्हन मांगे दहेज नामक उपन्यास में समस्या का दूसरा पहलू भी पेश किया जो कि दहेज निरोधक अधिनियम के दुरुपयोग तथा बहू के निर्दोष ससुराल वालों को दहेज लेने के नाम पर प्रताड़ित किए जाने को दर्शाता था । कई वर्षों के उपरांत वेदप्रकाश शर्मा ने समस्या को पुनः एक भिन्न कोण से देखते हुए दहेज में रिवॉल्वर तथा जादू भरा जाल शीर्षकों से दो भागों में एक वृहत् कथानक प्रस्तुत किया जिसमें उन्होंने उस युवती की भावनाओं और मानसिकता को उजागर किया जिसके माता-पिता उसके सुखी वैवाहिक जीवन हेतु दहेज जुटाने के लिए स्वयं कंगाल और अधमरे होकर भी दहेज-लोलुप लड़के वालों का सुरसा जैसा पेट भरते रहे हों ।

वेदप्रकाश शर्मा के उपन्यासों पर बहू की आवाज़ (१९८५), अनाम (१९९२), सबसे बड़ा खिलाड़ी (१९९५) तथा इंटरनेशनल खिलाड़ी (१९९९) जैसी फ़िल्में बनीं । अंतिम दो फ़िल्मों की पटकथा एवं संवाद भी उन्होंने ही लिखे लेकिन सबसे बड़ा खिलाड़ी को छोड़कर कोई भी फ़िल्म व्यावसायिक दृष्टि से सफल नहीं रही  । उनके द्वारा सृजित केशव पंडित नामक पात्र के कारनामों पर आधारित टी.वी. धारावाहिक का निर्माण भी एकता कपूर द्वारा किया गया जिसकी कड़ियों का लेखन वे स्वयं करते थे । वह भी विशेष सफल नहीं रहा । फ़िल्मी दुनिया में अपना कोई मुकाम बनाने की उनकी कोशिशों ने उनके लेखन पर विपरीत प्रभाव डाला । साथ ही वे शनैः-शनैः मनी-माइंडेड होकर लेखन की गुणवत्ता से अधिक उसके चतुराईपूर्ण विपणन एवं पाठकों से अधिक-से-अधिक वसूली करने में रुचि लेने लगे । अधिकाधिक धन कमाने की धुन में ही वेदप्रकाश शर्मा ने ऊंचे मूल्य वाले तथाकथित विशेषांकों की परंपरा डाली थी जिससे लुगदी उपन्यासों की कीमतें एकदम से बढ़कर आसमान छूने लगीं और केबल टी.वी. तथा इंटरनेट से स्पर्धा हो जाने के बाद उनका बाज़ार धीरे-धीरे घटते हुए अंततः बहुत कम हो गया । लेकिन धन कमाने के अंधे जुनून में फंस चुके वेदप्रकाश शर्मा दीवार पर लिखी इबारत को पढ़ नहीं सके । जिस तरह भारतीय सिनेमा के शोमैन राज कपूर ने अपनी लंबी फ़िल्म संगम (१९६४) की सफलता से भ्रमित होकर उससे भी अधिक लंबी फ़िल्म मेरा नाम जोकर (१९७०) बना डाली थी और उसका दुष्परिणाम घोर व्यावसायिक असफलता के रूप में भुगता था, उसी तरह वर्दी वाला गुंडा की सफलता से भ्रमित होकर वेदप्रकाश शर्मा ने भी वो साला खद्दरवाला नामक उपन्यास को भारी तामझाम एवं अतिप्रचार के साथ सामान्य मूल्य से ढाई गुने मूल्य पर निकाला जिसका वही हश्र हुआ जो राज कपूर के लिए मेरा नाम जोकर का हुआ था । और वहीं से अब तक शिखर पर बैठे वेदप्रकाश शर्मा का पतन आरंभ हुआ । और एक बार शुरू हुई फिसलन कभी थमी नहीं । सत्तर के दशक में हुए उनके अभूतपूर्व उत्थान की भाँति ही नव सहस्राब्दी में हुआ उनका पतन भी उतना ही आश्चर्यचकित कर देने वाला रहा जिसके लिए वे स्वयं ही उत्तरदायी थे ।

लेकिन इस व्यवसाय के और उनकी प्रतिष्ठा के ताबूत में सबसे शक्तिशाली कील तब पड़ी जब धन कमाने की धुन में वे ऐसी दुराशा में पड़े कि अपनी कलम के साथ ही बेईमानी कर बैठे । इक्कीसवीं सदी में उनके नाम से प्रकाशित कई उपन्यासों पर उनकी हलकी गुणवत्ता एवं भिन्न लेखन-शैली के कारण इस संदेह के लिए पर्याप्त आधार उपस्थित है कि वे उन्होंने किसी और से लिखवाकर अपने नाम से प्रकाशित कर दिए थे (जबकि वे अकसर कहते रहते थे कि उनके लेखन काल के प्रारम्भिक वर्षों में उनके कई उपन्यास दूसरों के नामों से प्रकाशित हुए थे और १९९० में उन्होंने मनोज पॉकेट बुक्स पर अपने नाम से नक़ली उपन्यास छापने का मुक़दमा भी किया था) । इसके अतिरिक्त उनके कतिपय उपन्यास उनके अपने ही पुराने उपन्यासों के टुकड़े जोड़कर बनाए गए निकले । अपने पाठकों को सदा मेरे प्रेरक पाठकों कहने वाले वेदप्रकाश शर्मा द्वारा अपने उन्हीं प्रशंसकों के साथ किया गया यह छल उनकी साख को ले डूबा । २०१० तक तो यह हाल हो गया था कि किसी समय बुक स्टाल पर आते ही बिक जाने वाले वेदप्रकाश शर्मा के उपन्यासों को खरीदने वाले अब ढूंढे नहीं मिलते थे । महीनों-महीनों उनके नये उपन्यासों की प्रतीक्षा करने वाले अब उनके नये उपन्यासों को देखते ही बिदकने लगे थे । इसके अतिरिक्त उनकी पुरानी प्रतिष्ठा को अधिक-से-अधिक निचोड़ने के लिए उनके पुराने लोकप्रिय उपन्यासों को ब्लैकमेलिंग जैसी ऊंची कीमत पर बेचकर की जाने वाली मुनाफ़ाखोरी ने भी उनकी प्रतिष्ठा को भारी आघात पहुँचाया । सारांश यह कि जब लेखन-कर्म प्रधान था तो वे शिखर पर थे, जब धन प्रधान हो गया तो वे रसातल में जा पहुँचे । इस प्रकार जनसामान्य में अत्यंत लोकप्रिय एक लेखक के रूप में उनका सूर्यास्त हो गया ।

तथापि यह एक अटल सत्य है कि सत्तर के दशक के अंत से लेकर नब्बे के दशक के अंत तक वेदप्रकाश शर्मा ने हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में अपनी अमिट छाप छोड़ी । लुगदी साहित्य के नाम से पुकारे जाने वाले उनके लेखन कर्म की लोकप्रियता को ही नहीं, हिन्दी पठन-पाठन के क्षेत्र में उनके योगदान को भी तथाकथित उत्कृष्ट साहित्य से जुड़े लोग नकार नहीं सकते । गुलशन नन्दा के उपरां यदि किसी हिन्दी उपन्यासकार ने उपन्यास-लेखन के माध्यम से समृद्धि अर्जित की तो वे वेदप्रकाश शर्मा ही रहे । वे अब स्मृति-शेष हैं और आकस्मिक देहावसान की पृष्ठभूमि में उनका पर्याप्त महिमामंडन हो चुकने के उपरांत अब उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व का वस्तुपरक आकलन वर्षों तक चलता रहेगा । राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रसार तथा लोगों को हिन्दी पुस्तकें पढ़ने के लिए प्रेरित करने की दिशा में उनका योगदान अनमोल है । इस असाधारण हिन्दी उपन्यासकार को मेरी हार्दिक श्रद्धांजलि ।

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